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  #21  
Old 19th March 2017
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chapter 3 bhi likh dalo mitr ...........
Bahut hee shandaar suruaat hui sutr ki ...
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"नीलाम कुछ इस कदर हुए, बाज़ार-ए-वफ़ा में हम आज.
बोली लगाने वाले भी वो ही थे, जो कभी झोली फैला कर माँगा करते थे!!

"SOME TIME MY ATTEMPT MAY FAIL, BUT I NEVER FAIL TO MAKE AN ATTEMPT.

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  #22  
Old 19th March 2017
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sunoanuj sunoanuj is offline
 
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Likh dalo bhai chapter 4
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मेरी पीठ पर जो जख्म हैं वो तो अपनों की ही निशानी हैं, वरना सीना तो आज भी दुश्मनो की इंतजार मे बैठा है..

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  #23  
Old 19th March 2017
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katorewala gareeb
 
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Waiting for next
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hamesha khush raho chahe haalat kaise bhi ho

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  #24  
Old 19th March 2017
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चैप्टर 3

शाम को रामलाल की नींद लखन सिंह की आवाज से टूटी । रामलाल घर से बाहर निकला तो देखा की लखन सिंह दरवाजे पे खड़े थे।
रामलाल बोला " ताऊ प्रणाम आओ अंदर आओ। "
लखन सिंह " न बेटा अभी नहीं अभी तू जल्दी मेरे साथ चल काम है तुझसे ।"
रामलाल " क्या काम ताऊ ?"
लेखन सिंह " तू तैयार हो जा बड़ी हवेली चलना है जरुरी काम से ।"
रामलाल एक बार के लिए चौंका बड़ी हवेली पर ताऊ की बात मान कर चलने के लिए तैयार हो गया । कुछ देर बाद दोनों बड़ी हवेली को चल पड़े।
रामलाल ने लखन सिंह से पूछा " ताऊ हवेली वालो को मुझसे क्या काम मैं तो अभी गांव आया हु ।"
लखन सिंह " अरे वहां के दीवान जी ने बुलाया है ।"

रामलाल को अब बड़ी हवेली से जुडी बचपन की यादें याद आने लगती हैं की कैसे अगर किसी को बड़ी हवेली से बुलावा आया जाता तो आधे लोगो की जान ही सूख जाती थी । एक जमाना था जब बड़ी हवेली राजा हुकमसिंह की रियासत का केंद्र हुआ करती थी । राजा हुकमसिंह बड़ा ही खूंखार और ऐय्याश किस्म का राजा था इसलिए अगर किसी गाँव वाले को हवेली से बुलावा आया जाता तो इसका मतलब होता की उसने हुकमसिंह की नाराजगी मोल ले ली हो और अब उसकी खैर नहीं । हुकमसिंह की तक़रीबन दस साल पहले शिकार के वक्त घोड़े से गिर कर मौत हो गयी और उसके खौफ के साम्राज्य का अंत हो गया । हुकमसिंह की मृत्यु के बाद अब उसकी विधवा रानी ललिता देवी ने राज पाट संभाला । रानी ललिता स्वाभाव से दयालु थी उन्होंने गाँव वालों की पिछले कुछ वर्षों में बहुत मदद की और इस समय वो विधायक भी हैं यहाँ की । पर अब भी अगर किसी को बड़ी हवेली से बुलावा आ जाता है तो कोई मना नहीं कर सकता ।
कुछ देर चलने के बाद रामलाल और लखन सिंह बड़ी हवेली पहुचते हैं । हवेली अब भी पहले की तरह ही सजी धजी थी बाहर सुरक्षा के लिए लठैतों की पूरी सेना तैनात थी । लखनसिंह ने दरवाजे पे पहुचकर अपने सर से पगड़ी और पैर से जूती निकल के हाथ में लेली। भारत को आजाद हुए 13 साल हो गए थे पर गुलामी की ये परंपरा अभी जिन्दा थी । रामलाल ने भी मन मारते हुए अपना जूता निकल के हाथ में ले लिया और लखन सिंह जे पीछे पीछे हवेली में हो लिया ।
हवेली के अंदर की भव्यता तो बाहर से भी ज्यादा थी । हर जगह सजावट की महँगी महँगी चीज़े लगी हुई थी । कुछ देर बाद लखन सिंह और रामलाल एक कमरे में पहुचे जहाँ बड़े से दीवान पे एक बूढ़ा आदमी बैठा हुआ था ।
लखन सिंह ने उससे कहा " प्रणाम दीवान जी "
उस बूढ़े ने लखन सिंह को देखा और बोला " आओ लखन सिंह आओ "
लखन सिंह आगे बढ़ा और बोला " दीवान जी यही है मेरा भतीजा रामलाल जिसके बारे में मैंने आपको बताया था "
रामलाल ने भी दीवानजी को प्रणाम किया।
दीवान ने कहा " अच्छा तो ये है रामलाल आओ बैठो "
वहां कुर्सियां तो लगी हुई थी पर लखन सिंह ज़मीन पर बैठ गया और रामलाल भी मन मारकर ज़मीन पर बैठ गया । फिर दीवान जी बोले " हाँ तो बेटा रामलाल तुम फ़ौज में थे ?"
रामलाल " जी दिवान जी "
दीवान " अच्छा तो बेटा तुम्हे अंग्रेजी तो आती होगी ।"
रामलाल " बहुत अच्छे से तो नहीं हां पर पढ़ लेता हूं लिख लेता हूं और टूटी फूटी बोल भी लेता हूं ।"
दिवान " बहुत अच्छे बेटा हमे तुमसे ही काम था देखो अब मेरी उम्र में मुझसे सही से देखा नहीं जाता एक चिट्ठी आयी थी विदेश से जो मैं पढ़ नहीं पा रहा था अब ईस रियासत में ज्यादा पढ़ा लिखा तो कोई है नहीं और अंग्रेजी पढ़ना सबके बस की बात नहीं इसलिये मैं बहुत परेशान था । आज सुबह लखन सिंह ने तुम्हारे बारे में बताया तो मैंने ही तुम्हे यहाँ लाने के लिए बोला ।"
रामलाल " ठीक है आप मुझे वो चिट्ठी दीजिये मैं पढ़ देता हूं ।"
फिर दीवान ने एक चिट्ठी निकाल के रामलाल को दी । रामलाल ने वो चिट्ठी पढ़के दीवान को सुना दी ।
दिवान बोला " बस बेटा बहुत धन्यवाद अब तुम जा सकते हो ।"
फिर रामलाल और लखन सिंह दीवानजी को प्रणाम करके हवेली से अपने गाँव लौट आते हैं । गाँव पहुचकर लखन सिंह रामलाल से कहता है " आओ बेटा आज रात का भोजन मेरे घर करो । शांति को भी तुम से मिल कर अच्छा लगेगा ।"
रामलाल " ठीक है चाचा ।"
रामलाल शांति के बारे में सोचने लगता है। शांति और रामलाल की उम्र लगभग एक ही होगी दोनों साथ ही पले बढ़े । लखन सिंह ने शांति का ब्याह बचपन में ही कर दिया था पर उसके ससुराल जाने से पहले ही उसके पति की मौत हो गयी। गाँव वालों ने शांति को अपशकुनी मान किया और लखन सिंह पे बहुत दबाव डाला की वो शांति को काशी छोड़ आए विधवाओं की तरह जीने के लिए । पर लखन सिंह ने किसी की एक न सुनी और शांति को अपने पास ही रखा । लखन सिंह की पत्नी के गुजरने के बाद शांति ही उनका आखिरी सहारा थी ।
कुछ ही देर में दोनों लखन सिंह के घर पहुचते हैं ।
लखन सिंह दरवाजे से आवाज लगाते हैं " शांति ओ शांति देख तो कौन आया है ?"
कुछ देर बाद सफ़ेद साड़ी में एक औरत घर से निकलती है । रामलाल उसको देखता है करीब 30 32 की होगी शांति रंग गोरा पर चेहरे पे एक अजीब सी वीरानी छाई हुई थी । शांति रामलाल को देखती है और कहती है " रामलाल भैया नमस्ते ।"
रमलाल " कैसी हो शांति "
शांति " ठीक ही हु भैया "
लखन सिंह " अब जा दौड़ के रामलाल के लिए पीने के लिए पानी ले आ और जल्दी से खाना बना दे आज रामलाल हमारे साथ ही खाना खायेगा ।"
शांती घर के अंदर चली जाती है और रामलाल और लखन सिंह घर के बाहर बैठ के हुक्का गुड़्गुड़ाने लगते हैं । कुछ ही देर बाद शांति पानी लेके आती है। रामलाल को पानी देने को झुकती है तो उसका पल्लू सरक जाता है और रामलाल को उसकी चूची की घाटियों का दर्शन हो जाता है । शांति रामलाल को नजरों को भांप लेती है और झट से अपना पल्लू सही कर घर के अंदर चली गयी।
कुछ देर तक रामलाल और लखन सिंह इधर उधर की बातें करते हैं । तब तक शांति खाना तैयार कर लेती है और उन्हें खाने के लिये बुलाती । घर के अंदर रसोई में खाने की व्यवस्था रहती है । रामलाल और लखन सिंह खाना खाने लगते हैं । कुछ देर बाद शान्ति रामलाल से कुछ और लेना का पूछती है तो रामलाल सब्जी मांगता है । शान्ति रामलाल के सामने झुक के फिर से उसकी थाली में सब्जी परोसने लगती है। उसका पल्लू फिर नीचे ढुलक जाता है और रामलाल को पुनः एक बार उसकी घाटियों के दर्शन हो जाते हैं पर इस बार शान्ति उन्हें छुपाने की कोशिश नहीं करती । वो धीरे धीरे रामलाल को सब्जी परोसती है और रामलाल मन भर के दर्शन करता है। फिर वो वापस अपनी जगह चली जाती है। कुछ ही देर बाद रामलाल खाना ख़त्म करके घर चला आता है और शान्ति के बारे में सोच के मुट्ठ मार के सो जाता है।

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  #25  
Old 19th March 2017
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बहुत सुंदर।

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  #26  
Old 20th March 2017
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Bahut badhiya ...
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  #27  
Old 20th March 2017
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  #28  
Old 20th March 2017
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  #29  
Old 20th March 2017
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good start.
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  #30  
Old 20th March 2017
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अगली सुबह रामलाल की नींद कजरी के बुलाने की आवाज से खुलती है । रामलाल घर से बाहर निकालता है और कजरी से पूछता है " क्या हुआ ?"
कजरी " मालिक हमरे उ रात से ही घर नहीं आये हैं और आज खेतों में धान की रुपाई करना बहुत जरुरी है। थोड़ी ही देर में धुप तेज हो जायेगी तो काम करना मुश्किल हो जाएगा ।"
रामलाल " कहाँ है रमुआ ?"
कजरी " मालिक कहीं पी के पड़े हुईहै "
रामलाल " ठीक है तुम खेतों पे चलो मैं भी आता हूं "
कजरी " ठीक है मालिक "
रामलाल जल्दी से अपने सारी नित्यक्रिया पूरी करके खेतों पे पहुचता है । कजरी वहां पहले से ही धान की रुपाई कर रही होती है । कजरी अपनी साड़ी घुटनों तक उठा के कमर में खोंसी रहती है ताकि उसकी साडी खेत में भरे पानी से भीगे नहीं । रामलाल भी अपना कुरता उतार कर वही पास में एक पेड़ पर टांग देता है और अपनी धोती उठा के कमर पे बांध लेता है । धीरे धीरे दोनों खेतों में धान की रुपाई करने लगते हैं । करीब एक घंटे बाद अचानक आसमान में बादल छा जाते हैं और बारिश होने लगती है। बारिश के कारण मौसम सुहावना हो जाता है और दोनों को गर्मी से छुटकारा मिल जाता है। अब दोनों बारिश में भीगते हुए धान की रुपाई करने लगते हैं ।
तभी रामलाल पलट के कजरी के तरफ देखता है तो वो उसकी तरफ पीठ करके झुक के धान की रुपाई कर रही होती है । बारिश के कारण उसकी साडी भीगके उसके बदन से चिपक गयी रहती है । रामलाल को अब उसकी गांड एकदम साफ झलक रही होती है । रामलाल का लंड सलामी देने लगता है और उसकी काम भावनाएं भड़कने लगती हैं। वो धीरे धीरे कजरी के तरफ बढ़ने लगता है । जब वो उसके पास पहुचता है तो अचानक कजरी पलट जाती है पर उसका पैर फिसल जाता है। कजरी गिरने से बचने के लिए हाथ से कुछ पकड़ने की कोशिश करती है । उसके हाथ में रामलाल की धोती आ जाती है पर वो उसे गिरने से नहीं बचा पाती। नतीजा ये होता है कजरी पानी में छपाक से गिरती है और उधर रामलाल की धोती और लंगोट खुलके कजरी के हाथ में आ जाता है। कजरी की आँखों के सामने रामलाल का लंड झटके खा रहा होता है वो एकटक उसे देखने लगती है। उधर पानी में गिरने से कजरी के कपडे और भीगके उसके शरीर से चिपक जाते है और रामलाल को अब उसकी चूचियो का आकार साफ़ झलक रहा होता है । रामलाल से अब बर्दाश्त नहीं हो होता वो झुक के कजरी को अपनी गोद में उठा लेता है और उसे लेके खेत के किनारे पेड़ के नीचे लाके लिटा देता है । कजरी भी उसका कोई विरोध नहीं करती ये देख के रामलाल की हिम्मत बढ़ जाती है । रामलाल अब कजरी की साड़ी ऊपर उठा देता है जिससे उसकी चूत उसके सामने आ जाती है । रामलाल उसकी चूत की फांको को फैला कर उसकी चूत के दाने को अपने उंगलियों में लेके मसलने लगता है। कजरी को तो जैसे करंट लग गया हो वो एकदम से आनंद से अकड़ जाती है ।
धीरे धीरे जब कजरी की चूत हल्का हल्का पनियाने लगती है तो रामलाल उसमे एक ऊँगली डाल के अंदर बाहर करने लगता है। कजरी की अनान्द के मारे सिसकारियां निकलने लगती हैं। उसने ऐसे अनान्द की अनुभूति पहले कभी नहीं की थी । रामू तो बस लंड घुसा के अपना काम निपटा के सो जाता था पर रामलाल जो कर रहा था उससे कजरी को आज ये एहसास हो रहा था कि कामक्रिया का अनान्द क्या होता है। रामलाल की ऊँगली अब कजरी के चूत के रस से सन चुकी थी । रामलाल ने अपने लंड पे थूक लगाया और कजरी के पैरों के बीच आ गया। कजरी तो जैसे उसकी गुलाम जो गयी थी उसने कोई प्रतिकार नहीं किया। रामलाल ने अब अपना लंड उसकी चूत जे मुँह पे सेट किया और एक जोर का धक्का लगाया उसका लंड थोड़ा सा कजरी की चूत में घुस गया। कजरी जे मुह से हलकी सी घुटी हुई चीख निकल गयी। रामलाल अब अपने लंड को हल्का हल्का आगे पीछे करने लगा। थोड़ी देर बाद उसने एक और धक्का मारा अबकी बार रामलाल का लंड सरक के कजरी के चूत में पूरा का पूरा घुस गया। कजरी को ऐसा लगा जैसे रामलाल के लंड ने उसकी चूत को पूरा भर दिया हो। अब रामलाल कजरी के ऊपर लेट गया और अपना लंड जोर जोर से कजरी की चूत में पेलने लगा। कजरी असीम अनान्द में सराबोर खो गयी उसने अपनी दोनों टाँगे उठा के रामलाल की कमर पे रख ली जैसे की रामलाल का लंड उसकी चूत की और गहराई तक जा सके। रामलाल ने भी अब अपने धक्कों की स्पीड बढ़ाई तो कजरी के मुह से अजीब अजीब आवाजे आने लगी " हाय दैया ....उफ़्फ़ ...आह ....हाय अम्मा ....मार डाला मालिक ......और जोर से ....हाय ....हाय.... रमुआ ने तो कभी ऐसा मजा नहीं दिया .....और जोर से ......"
कजरी की ये बातें रामलाल को और उत्तेजित करने लगी और वो भी कजरी की चूत में लंबे लंबे शॉट मारने लगा । तभी कजरी का बदन पूरी तरह से अकड़ गया और वो झड़ गयी। रामलाल भी फिर अगले ही शॉट में कजरी की चूत में अपना वीर्य उगलते हुए झड़ गया।
रामलाल कजरी के ऊपर से हट के उसके बगल में लेट गया। कजरी भी कुछ देर वही ज़मीन ओर उस बगल पड़ी रही । फिर उसे दीन दुनिया का ध्यान आया और वो जल्दी से अपने कपडे सही करते हुए गाँव को चली गयी। कजरी ने जाते वक्त पलट के एक बार भी रामलाल की तरफ नहीं देखा रामलाल को लगा शायद वो भावनओं में बह गयी और अब उसे पश्चाताप हो रहा होगा। रामलाल ने भी सोचा की अब अगर कजरी पहल नहीं करेगी तो वो भी नहीं करेगा । फिर रामलाल ने अपने कपडे जो वही खेत में पड़े थे उठाये उन्हें साफ किया फिर पहन कर गाँव की तरफ चल दिया।

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