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  #51  
Old 1st January 2017
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हर सुपात्र को प्यार करना होगा। क्योकि जब हम सुपात्र से प्रेम करना शुरू करते है तो, लोभ मोह ईर्ष्या द्वेष निंदा इत्यादि दुर्भावनाएं स्वतः ही भाग जाती है और सेवा, प्रेम, करुणा, सहायता आनंद इत्यादि सदभावनाएँ जागृत हो जाती है और इसी से उदय होता है सत्कर्म का संसार में प्यार का सबसे सुपात्र कौन ?
अपनी जननी, अपनी माँ, माँ के बाद सबसे सुपात्र कौन।
और कौन होगा मित्रो, खुद ईश्वर, मालिक, देवी माँ। जिन्हे भी आप इष्ट मानते हो। सारे जहां के मालिक को हम निरीह मानव दे भी क्या सकते है। सिर्फ प्यार, सिर्फ प्रेम। विशुद्ध प्रेम।
इस संसार के प्रायः सभी महापुरुषों ने यही कहा है। हर सुपात्र को,,,,,,, " प्यार बांटते चलो ",,,,,,,,, कई गुना होके वापस मिलेगा हमें। सन्तुष्टि तो प्यार करना शुरू करते ही साथ में आके पास बैठ जाएगी। और खुशियों का क्या है, वो तो सन्तुष्टि की प्रिय सहेली है। उसे तो साथ आना ही है। हाँ हमारे कर्म ,फल,,,,,,,अच्छा या बुरा ,,,,, वो तो साथ चलेगा ही।
नोट - उपरोक्त कथन मेरे अपने विचार है, और सहमति या असहमति पाठकोका अधिकार
है !

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  #52  
Old 1st January 2017
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नाश्ते के लिए हम सब बैठक में ही बैठ गए। आज नाश्ते में आलू भरी कचौड़ियाँ थी, काबुली चने के साथ। खुशबु से ही भूख दो गुना हो गई जी।
सबने नाश्ता खत्म किया और चाय के कप पकड़ के दालान ने आ गए।
सुबह का ९ बजे का वक्त था। सूर्य देवता अभी तक क्रोधित नहीं हुवे थे। सुबह की सुहानी हवाओं का शोर अभी थोड़ा ही सही,, बाकी था।
पंडित जी , अब आगे कैसे बढ़ा जाये,,,,,,, दमन ने बात शुरू की। बाबा तो हाथ ही नहीं रखने दे रहा है।
वही तो में भी सोच रहा हूँ दमन जी। अब किया भी क्या जाये जब वो महानुभाव बात भी करने को तैयार नहीं है। ऊपर से बात न मानने पर तंत्र प्रयोग ,,,,,,,,,,,,,,, मैंने जबाब दिया
लेकिन पंडित जी आप क्यों चुप रहे। कुछ तो आपको भी दिखाना था।,,,, दमन बोले
सन्यासी का प्रयोग अप्रत्याशित और गूढ़ था। देखा नहीं कैसा त्वरित दृष्टि उच्चाटन का प्रयोग किया उन्होंने । सिक्के की
शक्ति तो पल भर भी ना चली। उनको कम आंकना भारी भूल होगी ,,, मैंने स्थिति स्पष्ट की। और वैसे भी, उनकी मर्जी, वो मिलना चाहे या नहीं। हम जबरदस्ती करने वाले कौन होते है। मैंने अपनी सोच बताई ।

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  #53  
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पंडित जी सही कह रहे है। वो सन्यासी किसी का बुरा तो कर नहीं रहे है जो हम जा कर उनसे झगड़ा करने बैठ जाये। रतन जी ने भी विचार रखा।
तो क्या वापस चले जाये ? ... दमन ने चाय का खाली कप टेबल पर रखते हुवे कहा । आप की राय क्या है दमन जी ? ,,,,मैंने प्रश्नका उत्तर प्रश्न से ही दिया।इतनी दूर आकर खाली हाथ तो नहीं जाऊँगा में भाई। ये बाबा भी खिसका हुवा लगता है। अरे दो घड़ी बात कर लेगा तो क्या चला जायेगा उसका। ,,,,,
दमन ने कहा। में कुछ न बोला। कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था। वापस बैठक में गया और सोफे पर पसर गया।
पीछे पीछे दमन जी और रतन जी भी आ गए। पंडित जी कुछ तो बोलिए की करना क्या है। अबकी रतन जी ने पूछा। जबाब दमन जी की तरफ से आया, एक राय के रूप में। ,,, पंडित जी क्यों
न उनसे बिना मिले उनके क्रिया कलापो का अध्ययन किया जाये।
तुम्हारा मतलब छिप के ? ...मैंने पूछा !
छिपने का क्या है इसमें शमशान को अभी तक बाबे ने खरीदा तो न है ना ? वो अपने में मस्त, हम अपने में मस्त। ,,,,,
दमन ने अपना पक्ष रखा।
किया तो जा सकता है, लेकिन सोच लो ,,कही महोदय क्रुद्ध हो गए तो तलवारे चलने की नौबत आ जाएगी। ,,,मैंने बताया !

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  #54  
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महोदय की ऐसी की तैसी। हम उनके क्रिया कलापो में कोई विघ्न तो डालने जा नहीं रहे। दमन से जैसे फैसला सा सुनाया।
चलो ठीक है, अब आप कहते हो तो यही सही। चलते है आज रात उनके दर्शन को। मैंने भी हाँ कर दी।
बस रतन जी से विनती है की वो साथ जाने की जिद न करें। मैं रतन जी की तरफ देखता बोल उठा ! क्या पंडित जी, मुझे इतना डरपोक समझते है क्या? रतन जी थोड़ा अनमने से बोले।
बात हिम्मती या डरपोक की नहीं है रतन जी। शमशान में इन क्रिया कलापो में काफी खतरा रहता है। में आपको खतरे में नहीं डालना चाह रहा। कुछ भी हो, पंडित जी, ले के चलते तो अच्छा होता, ऐसा मौका बार बार थोड़े ही मिलता है ! रतन जी ने एक बार फिर से कोशिश की ! नहीं रतन जी, यहाँ सन्यासी पहले से बिगड़े हुए हैं। खतरा हो सकता है। विनती है आपसे। मेने बोला।
चलो भाई, फैसला हो गया। रतन जी नहीं जाएंगे और में और पंडित जी बाबे की रात की कारस्तानी देखने जाएंगे, मंजूर ?? दमन ने प्रश्न सा दागा लेकिन फैसले के सुर में ।
मंजूर ठाकुर साहब, आप का फैसला कौन टाल सकता है। मैंने बोला !

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  #55  
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हम तीनो मित्र मुस्कुरा उठे वो अलग बात है की मेरी मुस्कुराहटों के पीछे चिंता की लकीरे भी नाच रही थी।,,,,
हुई दोपहर, डट कर दोपहर का भोजन किया गया। उस दिन और तो कुछ करने को था नहीं, इस लिए रतन जी ने आज बगीचे में कुछ चारपाइयाँ डलवा दी थी। बगीचे में आम के घने पेड़ों की छाया मे मंद मंद बहती हवा मानो बदन को चुम कर निकल रही रही थी। थोड़ी देर तो यहाँ वहां की बातें चलती रही फिर हम सब एक एक कर उघते चले गए। हुई शाम, आज तो तैयारी करनी थी। क्या पता हमें बाबा देख ही ले, और कुपित होकर कुछ बड़ा प्रहार कर दे। मैंने दमन को इशारा किया, हाथ पांव धो लिए और चला गया कमरे में। इस इशारे का मतलब दमन अच्छी तरह से जानते थे। अब किसी को भी मेरे कमरे में मेरे बिना बुलाए नहीं आना था। अंदर आकर मैंने अपना सूटकेस खोल पूजन सामग्री निकाली। बाबा विश्वनाथ और माँ गौरी के स्थान बनाए और डूब गया ध्यान में। हो जाने वाली गलतियों के लिए क्षमा मांगी ,और अपनी और दमन की प्राण रक्षा की विनती करता रहा ।

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  #56  
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फिर कुछ देर तक माँ के ९ रूपों का बारी बारी ध्यान करता रहा और फिर आँखे खोल दी। अब आया मंत्रो का नंबर, कुछ महत्वपूर्ण रक्षक मंत्रो का जाप कर के उन्हें धार लगाई। कुछ एक मारक विद्याओं का भी संधान की विधि मन ही मन दोहरा ली , जिससे वक़्त आने पर तुरंत प्रयोग किया जा सके। अब मैने पूजन सामग्री वापस सूटकेस में रख लिया । और वो सन्दूकची निकल कर रख ली जिसमे तंत्र कवच रखता था। आज मुझे और दमन को इन्हे धारण करना अनिवार्य था. ऊंट किस करवट बैठेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता था। अंदर के काम पूरे करके और सभी सामान व्यवस्थित करके में बाहर निकला। दमन और रतन जी दालान में ही बैठे मिल गए। चले दमन जी, तैयारी करे, मैंने कहा ! बिलकुल पंडित जी, लेकिन मैं एक बार और नहा लेना चाहता हु। बड़ी गर्मी लग रही है यार। ठीक है, नहा लो आप में कमरे में आपका इंतज़ार करता हु। कहकर में वापस कमरे की तरफ
बढ़ गया। दमन जी नहा कर आ चुके थे। हमने कमरा अंदर से बंद कर लिया और तैयारियां शुरू कर दी। सर्वप्रथम, सिद्ध श्री बगलामुखी यन्त्र निकाला और पूजन पश्चात अपने और दमन जी के गले में धारण कर लिया।

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  #57  
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अस्थि करधन दोनों ने ही धारण किये। मंत्र सिद्ध रुद्राक्ष मैंने कलाइयों में लपेट लिए। एक और अस्थि रक्षा कवच दमन जी को पहना दिया। दमन जी मेरे सामने शिष्य भाव से झुके हुए पूरी श्रद्धा से सब कुछ ग्रहण करते चले गए। ह्रदय प्रदेश की रक्षा हेतु महाकाल पूजित मनको को हमने बाएं भुज दण्ड के रूप में धारण किया। अब शुरू हुई अंग पूजा। देवताओ के नाम से हर अंग का पूजन किया गया और देव चिन्ह अंकित किये गए। सन्यासी के सामर्थ्य का जो मैंने अनुमान लगाया था, उसके अनुसार रक्षण पर ज्यादा ही ध्यान दे रहा था। विस्की की एक बोतल और सिद्ध बटुक कपाल मैंने अपने एयर बैग में बाकी पूजन सामग्री के साथ रख लिया । भस्म तिलक लगाकर हम निकल पड़े दालान की ओर, जहां द्वार पर प्रह्लाद जी जिप्सी के साथ हमारा इंतज़ार कर रहे थे। जिप्सी के बगल में ही रतन जी थोड़े बेचैन से खड़े मिले। उनसे विदा ली और सवार हो गए जिप्सी पर। रतन जी फिर पास आये। मेरा हाथ आपने हाथो में लिया, आँखों में देखा, और केवल एक बात कही, पंडित जी अपना और दमन का ख्याल रखना। उनके हाथो में कम्पन सा महसूस किया मैंने।

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शायद उन्होंने शमशान की विकरालता तो उस दिन हमारे साथ पहली बार महसूस किया था, चिंतित से थे बेचारे। मैंने उनका हाथ आपने हाथो में लिया , कुछ नहीं होगा रतन जी। भोर की पहली किरण के साथ हम आपके पास लौट आएंगे। आप चिंता न करे। रात के आठ बजे का वक़्त होगा । हमने रस्ते से कुछ खाने पीने का सामान भी पैक कराया। शमशान की ओर जिप्सी का सफर जारी था.,,,,,,,,
शमशान पहुंचते पहुंचते रात के नौ बज चुके थे। हमने काम शुरू करने से पहले कुछ खा लेने का फैसला किया। तीनो ने ही पैक करा कर लाया संछिप्त सा भोजन ग्रहण किया और बाकी बचा उसी एल्युमीनियम की पन्नी में ही लपेट कर रख दिया। पानी पीकर में प्रह्लाद सिंह जी की तरफ मुखातिब हुवा ,,अंकल, जैसा की आप जानते है। कुछ भी संकट महसूस होने पर, चाहे कुछ भी हो जाये जिप्सी के बाहर मत निकलिएगा। हमेशा की तरह उन्होंने भी मुण्डी हिला दी। ऐसे मौकों पर सामान्यत तो वो स्थिति की गंभीरता देखते हुए गाड़ी के अंदर ही रहते है। लेकिन बड़े जीवट वाले है।

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  #59  
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भोजनोपरांत हमने शमशान में प्रवेश किया। आदतन शरारती भूत प्रेत हमारी तरफ लपकते हुवे महसूस हुए ! लेकिन कवचो की मौजूदगी का एहसास होते ही वो भाग छूटे । मसान का जागृत काल था ! उसके अनुचर अपने क्रियाकलापों में वयस्त थे । शमशान में तीन चिताएं धू धू कर के जल रही थी। चन्द्र प्रकाश तो क्षीण सा ही था लेकिन चिताग्नि की प्रदीप्ति शमशान में बिखरी हुई थी। हमने चारो तरफ निगाहे दौड़ाई। सन्यासी का कही आता पता ना था। डोम राज भी नदारत थे ! शायद कही व्यस्त होंगे, नहीं तो तीन तीन चिताओ को यूँही छोड़कर न जाते वो। शायद भोजन इत्यादि के लिए गए हो। हमारा ध्येय चुपचाप सन्यासी के क्रिया कलाप देखना था, अतः हम लोग बीच शमशान में ना जाकर शमशान के किनारे किनारे चलते हुए परली तरफ को निकल लिए। वहां एक पुराने अर्धनिर्मित भवन की एक टूटी दीवार हमारे छुपने का ठिकाना बन सकती थी। मित्रो, हमें अपने मकसद का एहसास था, और इस बात का भी एहसास था की सन्यासी अगर ना ही मिलना चाहें। या हमें यहाँ पा कर अत्यन्त क्रोधित भी हो जाये तो वो उनका हक़ होगा। मैंने निर्णय कर लिया था की मुझे किसी भी सूरत में हमलावर नहीं होना है। हां प्राण रक्षा तो करनी पड़ेगी ही।

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  #60  
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अब हमने दीवार के पीछे डेरा लगा लिया जी। और होने लगा उस रहस्यमयी सन्यासी का इंतज़ार।,,,,दमन जी ने अपने एयरबैग से निकाल कर चादर फोल्ड कर के नीचे बिछा दी और हम दोनों बैठ गए इंतज़ार में। दमन ने कार्बोलिक एसिड से भीगा रुई का फाहा भी बगल में रख लिया सर्प आदि से बचाव के लिए।
मित्रो इसकी गंध सर्प को बहुत अप्रिय लगती है और वो आस पास नहीं फटकता सर्प बिच्छुओं से तो बचाव हो जाता। लेकिन मच्छर थे की मान ही नहीं रहे थे। दमन तो अपने आप को कई झापड़ खुद ही लगा चुके थे। हमने ओडोमोस लिक्विड लगाया था, पर अब ये मच्छरों को कौन समझाए की जो ओडोमोस लगाया हो उसे नहीं तंग करना है। पंडित जी, ये सारे तांत्रिक मर के मच्छर तो नहीं बन जाते ? .दमन खीजे स्वर में फुसफुसाया। क्यों भाई ? क्या हो गया ? .. मैंने मुस्कुराते हुए पूछा ! होना क्या है यार, देखो तो, शमशान में कितने मच्छर भरे हुए है, ये साले मच्छर तो लगता है पहले कान में घुसके मंत्र जाप कर रहे है, फिर नरबलि की फ़िराक में खून पीने लगते है। मुझे हँसी आ गई,

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