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  #11  
Old 30th December 2016
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Originally Posted by luckyabu View Post
nice starting
धन्यवाद मित्र

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  #12  
Old 30th December 2016
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सन्यासी को ज्यादातर शमशान के आस पास ही भटकते सुना गया था। अतः हमने पहले शमशान क्षेत्र का ही निरीक्षण करने की ठानी। नदी क्षेत्र तक पहुंच कर हमने कच्ची सड़क पे जिप्सी मोड़ ली। रतन जी को वहा के रास्तो की
अच्छी जानकारी थी! वो ही आगे की सीट पर बैठकर प्रह्लाद सिंह को मार्गदर्शन दे रहे थे ।
शाम हो चली थी , सूर्यदेव की थकान सतत दृष्टिगोचर हो रही थी ! उनका मुंह गहरा लाल हो उठा था । निशा रानी की सहेलियों थके मादे भगवान भास्कर को चिढ़ाने आने लगी थी। लेकिन उनपे ध्यान न देते हुवे सूर्य देव ने विश्राम करना ही उचित समझा और चल पड़े
यमुना जी के उस पार के झुर्मुठो पे रात्रि विश्राम को।
श्मशान तक पहुंचते पहुंचते गधबेर हो गई थी लेकिन दृष्टि सुलभ रोशनी उपलब्ध थी। हम श्मशान के सिरे पर ही उतर लिए। वातावरण में चिता धूम्र गंध व्याप्त थी। ३ चिताएं जल रही थी और शाम होने के कारण अब तो लपटों की रोशनी भी महसूस होने लगी थी ! चौथी चिता सजाई जा रही थी । डोम राज
चौथी चिता के वाहको को कुछ समझा रहे थे।

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  #13  
Old 30th December 2016
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पहली नज़र में मैंने भाँप लिया ये एक साधारण न होके एक जागृत श्मशान
है। सोचा, डोम राज से ही सन्यासी का पता पूछ लूँ, पर उन्हें व्यस्त देखकर इरादा बदल दिया की कही महोदय भड़क ही न पड़े ।
तभी मुझे वहां के काली मंदिर का स्मरण हो आया जिसकी चर्चा रतन जी ने की थी। घाट से नज़रे घूमी तो घाट से
काफी दूर हमें शाम के धुंधलके में एक भव्य छायाचित्र सा मंदिर दृष्टिगोचर हुवा। बरबस ही कदम चल पड़े मंदिर
की ओर। शमशान के माहौल में बेचारे रतन जी थोड़े असहज से दिखा रहे थे ! मैंने दमन को इशारा किया और फिर
हमने रतन जी को बीच ही रख कर मंदिर की ओर चलना शुरू किया । निकट पहुंच कर थोड़ी निराशा सी हुवी। मंदिर आधे से ज्यादा ध्वस्त नज़र आया।शायद अब वहा कोई पूजा पाठ नहीं
होती थी। प्रवेश द्वार की जगह केवल दो खंभे ही बचे थे उनके ही सहारे पत्थरो द्वारा निर्मित एक दीवार जाती सी लग रही थी जो की अब केवल खँडहर सा ही बोध दे रही थी। प्रवेश द्वार के नीचे के सारी सीढ़िया वक़्त के थपेड़ो की भेट चढ़ गयी थी।

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  #14  
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बस कुछ टूटे फूटे पत्थर ही पुरानी कहानी बयां करने को बचे थे।
पुराने मंदिर को देखते ही दमन के अंदर का पुरातत्वविद जाग उठा। लपक कर टूटे फूटे पत्थरो पर पैर जमाता वो ऊपर चढ़ गया। जोर लगाके हम और रतन जी भी अब मुख्य द्वार के पार पहुंच
गए। अचानक दमन खम्भों पर घिस चुके भित्ति चित्रों की तरफ आकर्षित हुवे।

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  #15  
Old 30th December 2016
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kitna copy paste karo ge cobra ji

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  #16  
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पंडित जी , जरा इधर देखना। ,,,, दमन सिंह ने आवाज दी. ! वो जेब से निकाल कर अपना चश्मा आखो पर चढ़ा चुके थे !
मैंने जेब से पेंसिल टोर्च निकाली और स्तम्भ पर उस जगह रोशनी की जहां दमन ने बताया था ये उर्ध्वगामी बाराह
देवता की तांत्रिक छवि ही है न। ,,,,,, दमन ने मानो मेरी गवाही चाही
हाँ दमन , लगता तो यही है , छवि थोड़ी घिसी हुवी है और देवता के दन्त पर विराजमान पृथ्वी थोड़ी अस्पष्ट है , लेकिन लगती तो वही है। मैंने अपनी राय दी चलो पहले मंदिर में निरीक्षण ही कर ले , कही सन्यासी महोदय यही नविराजमान हो ,,,, मैंने कहा
सही कहा पंडित जी। पता चला वो अंदर हो और हमारे इस तरह अचानक
आ जाने से व्यर्थ का झगड़ा शुरू हो जाये। फिर क्या था , हम लोग सरसरी निगाहो से पूरा मंदिर घूम गए। पर सन्यासी का कही नामोनिशान ना पा सके
सन्यासी मंदिर परिसर में नहीं थे। शंका का समाधान होते ही हम फिर से मंदिर के बनावट और उसके खंडहरों के भब्यता में खो से गये थे ।

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  #17  
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Originally Posted by :jethiya: View Post
kitna copy paste karo ge cobra ji
जितना हो सकेगा और जब तक आप लोग पसन्द करेंगे ।

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  #18  
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निसंदेह बड़ा ही भव्य और विशाल मंदिर रहा होगा किसी समय ये। उसपर से शक्ति मंदिर और शमशान का मेल किसी प्रभावशाली साधना केंद्र की औरइशारा करता था। हाँ अब माँ की मूर्ति मंदिर में विद्यमान नहीं थी। शायद पहले ही स्थानांतरित कर दी गई हो
दमन कुछ देर तक दोनों स्तम्भों और दीवार के खंडहर का ध्यान पूर्वक
निरीक्षण करते रहे फिर आगे बढ़ के परिक्रमा में पहुंच गए। बहुत ध्यान देने पर ही वो परिक्रमा सा लगा नहीं तो वो
पूरा केवल पुराने पत्थरो का बेतरतीब ढेर ही दिखता था पंडित जी , ये कम से कम ५०० वर्ष पुराना शक्ति उपासना स्थल प्रतीत हो रहा है। परन्तु सही सही तो पुरे अनुसन्धान के बाद ही बताया जा सकता है। दमन ने अपनी
सोच साझा की भाई मेरे , हम सन्यासीसे मिलने आये है या "पहलवान" जी की पुरातात्विक खोज में भाग लेने आये है। रतन जी ने अपने पुराने मित्र दमन
को छेड़ा। हम सब को सामान्य देख कर अब वो भी थोड़ा सामान्य हो चले थे।,,,,

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  #19  
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अरे तो क्या आँखे मूँद कर खोजूँ सन्यासी को। अरे यार , मंदिर में आ गए देखने तो बस देख भर रहा हूँ। आपकी
किडनी में उबाल क्यों आ रहा है। दमन जी आदत के हिसाब से थोड़ा चिढ़ कर बोले मैंने बीचबचाव सा किया
, अच्छा सुनिए , में थोड़ा गर्भ गृह एक बार और देखना चाहता हु।
चलो जी फिर देख लेते है , उसमे क्या है। दोनों साथ ही बोल पड़े मैंने और दमन ने अपने जेब में रखे अभिमंत्रित सिक्के को जेब के ऊपर से ही थपथपा कर उपस्थिति सुनिश्चित की। एक अंजानशमशान के खँडहर हो चुके मंदिर में वो ही हम तीनो का प्राथमिक रक्षा कवच
था । रतन जी को अपने और दमन के बीच में लिया और खँडहर में अंदर की और चल पड़े हम सभी गर्भ गृह में एक
बार फिर पहुंच गए। में थोड़ा शक्ति स्थल का जायजा अपने शोध कार्य हेतु लेना चाहता था।
अष्टभुजा आकार में बना गर्भ गृह हमारी टार्चों की रोशनी में अपने ध्वस्त अवशेषो के साथ भी अत्त्यन्त भव्य प्रतीत हो रहा था !

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  #20  
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फर्श पर धूल धूसरित पैरो के निशान भीदिखे , जिससे प्रतीत हो रहा था की
कोई और भी फ़िलहाल में ही अवश्य आया होगा यहाँ।
मन में प्रश्न उपजा कौन ??? लेकिन उत्तर नदारत था उन्नत मूर्ति स्थान के सामने ही एक गहरा वर्गाकार हवन कुंडथा। मूर्ति स्थान पर भी छत के टूटे पत्थर गिरे हुवे थे। हवन स्थल भी मिटटी और धूल से अटा पड़ा था। हवन स्थल के आगे बलि वेदी सा एक शिला
खण्ड विद्यमान था।
शिला खण्ड का घिसाव उसपर होने वाली अनगिनत बलियो का प्रमाण सा लग रहा था हमारी घूमती टार्च की रोशनी पुरे गृह में नाच रही थी , में थोड़ा आगे बढ़ कर बलि वेदी तक पंहुचा। धूल धुसरित फर्श पर हमारे कदमो के गहरे निशान पड़ते जा रहे थे। अचानक दमन ने हमें टोका , ,,,,,,,,पंडित जी , मेरे जूतों के नीचे कुछ अजीब सा लग रहा है।
हमारी तीनो टॉर्च दमन के जूतों की तरफ घूम गई। तब तक दमन ने अपने पैर
वापस खींच लिए थे कोई कंकड़ तो नहीं चुभ गया। ,,,,,,,,,,, मैंने पूछा नहीं पंडित जी , कुछ लिजलिजा सा है। पता
नहीं क्या है धूल में मिला हुवा

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