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  #31  
Old 8th May 2016
badmaster122 badmaster122 is offline
 
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विवेक- ओए.. चुप चुप.. कोई कुछ मत बोलना.. मेरे बॉस (टोनी) का फ़ोन है।

विवेक- हैलो बॉस कैसे हो आप?

टोनी- कहाँ हो तुम दोनों?

विवेक- ज..ज़ि..जी यहीं हैं घर पे..

टोनी- सालों दारू पीकर पड़े हो.. मैंने तुमको पैसे किस लिए दिए थे?

विवेक- नहीं नहीं बॉस.. आपका काम कर दिया हमने.. कोमल को ले आए..

टोनी- गुड.. अच्छा सुनो.. मैं नहीं आ पाऊँगा.. मैंने जो बताया था.. कोमल को समझा देना और कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए.. समझे?

विवेक- ना ना बॉस.. आपका काम जल्दी हो जाएगा..* और कोमल को भी मैं समझा दूँगा.. आप बेफिकर रहो।

टोनी- ठीक है.. ठीक है.. अब गौर से सुन.. वो कुत्ता फार्म हाउस पर है.. कल तुम दोनों वहाँ पहुँच जाना.. समझे? बाकी की बात तुमको बताने की जरूरत है क्या?

विवेक- नहीं नहीं बॉस.. मुझे पता है क्या करना है.. आप समझो बस हम वहाँ पहुँच गए।

कोमल- अरे किसका फ़ोन था.. तू ऐसे क्यों डर गया?

सुनील- अरे साली.. तेरे को नहीं पता क्या.. बॉस का फ़ोन था। उन्हीं ने तो तेरे को लाने को कहा है और तेरे को जो पैसे हमने दिए हैं वो उन्हीं ने हमें दिए थे।

कोमल- तेरे बॉस ने मेरे को लाने के पैसे तुमको दिए.. और सालों तुमने उनके पहले मेरे को चोद कर मज़ा ले लिया.. सालों अब मैं उसके पास नहीं चुदवाऊँगी.. उसके साथ चुदाई के एक्सट्रा पैसे लगेंगे.. सोच लेना हाँ..

सुनील- अबे चुप साली.. बॉस तेरे को नहीं चोदेंगे.. उनको तो तेरे से दूसरा काम है।

कोमल- क्यों तेरा बॉस नामर्द है क्या..? जो पैसे खर्चा करके बस मेरी चुदाई होते देखेगा हा हा हा हा..

विवेक- अरे साली छिनाल.. पूरी बात तो सुन ले पहले.. अपनी ही बोले जा रही है तू हरामजादी।

कोमल- ओ साला.. भड़वा.. गाली नहीं दे मेरे को.. हाँ नहीं तो.. गाली मेरे को भी आती है.. समझा क्या?

विवेक- अच्छा मेरी जान प्लीज़ चुप हो जा और आराम से तू मेरी बात सुन।

कोमल- ठीक है रे.. सुना साला.. मैं अब कुछ नहीं बोलेगी।

विवेक- देख रानी.. तू एक कॉलेज गर्ल है और दिखती भी मस्त है। मज़े की बात ये कि तू चुदक्कड़ होते हुए भी शक्ल से बड़ी शरीफ दिखती है.. तो हमारे बॉस को तेरे से कुछ काम है.. इसलिए वो तेरे से मिलना चाहते थे। अब तू साली खाली बात के लिए तो यहाँ आती नहीं.. और हमको पता था बॉस खाली बात ही करेगा.. तो बस हमने सोचा बॉस खाली बात करेंगे.. तो क्यों ना हम तेरी चुदाई करके पैसे वसूल कर लें।

कोमल- कौन है रे तेरा बॉस.. वो कब आएगा..

विवेक- बॉस कहीं बिज़ी हैं. वे नहीं आएँगे.. मेरे को वो बात पता है.. तो मैं भी तेरे को समझा सकता हूँ।

सुनील- यार जब मैंने बॉस को कहा था ये बात हम कोमल को बता देंगे.. तब तो वो गुस्सा हो गए थे। बोले.. नहीं मैं ही अच्छी तरह से बताऊँगा.. अब क्या हुआ..

विवेक- अरे यार अब ये बॉस का फंडा वही जाने.. कहीं फँस गए होंगे किसी काम में.. अब कोमल को हमें सब समझाना होगा और वैसे भी बॉस फार्म पर तो आएँगे ही.. बाकी का काम वहाँ हो जाएगा।

कोमल- अबे सालों क्या समझाना है.. कुछ मेरे को भी तो बताओ?

विवेक- ठीक है मेरी जान.. गौर से सुन.. अब दिल्ली से कुछ दूर एक फार्म-हाउस है। हर 2 या 3 महीने में वहाँ एक बड़ी पार्टी होती है.. जहाँ फुल शराब और मस्ती होती है। साथ ही एक खास किस्म का गेम भी खेला जाता है।

कोमल- किस तरह का गेम?

विवेक- अबे सुन तो साली.. बीच में बोलती है तू.. वो गेम कोई पैसों का नहीं होता है। वहाँ सब अपनी गर्लफ्रेण्ड को लेकर जाते हैं और हम गर्ल फ्रेण्ड के साथ टीम बना कर तीन पत्ती का गेम खेलते हैं और जो हरता है.. हर बाजी के साथ उसकी गर्लफ्रेण्ड को एक कपड़ा उतारना होता है। ऐसे धीरे-धीरे सबके कपड़े उतरते हैं और जिस लड़की के कपड़े सबसे पहले पूरे उतर जाते हैं उसकी टीम हार जाती है। फिर उस रात सभी जीतने वाले उसके साथ सुहागरात मनाते हैं।

कोमल- ओ माय गॉड.. ये तो बहुत ख़तरनाक गेम है.. एक लड़की के साथ सभी चुदाई करते हैं? उसकी जान नहीं निकल जाती.. वैसे वहाँ कितने लड़के होते हैं.?

विवेक- अरे कुछ नहीं होता.. ज़्यादा नहीं बस हर बार 6 लड़के होते हैं। जिसमें हारने वाला तो चोदता नहीं है.. तो बस रात भर 5 ही लौंडे लड़की की चुदाई का मज़ा लेते हैं। फिर दूसरे दिन सुबह वो लड़का गेम से निकल जाता है और बाकी के लोग गेम खेलते हैं। बड़ा मज़ा आता है यार..

कोमल- ओह.. ये बात है.. वैसे हर बार सभी लोग वही होते हैं या अलग-अलग होते हैं?

विवेक- नहीं.. बस तीन लड़के वही होते हैं और 3 को हर बार अलग चुना जाता है।

कोमल- ऐसा क्यों.. वो 3 कौन हैं और दूसरों को कैसे चुनते हैं?

विवेक- मेरी जान तूने संजय खन्ना का नाम तो सुना होगा? उसका बेटा पुनीत ये पार्टी देता है.. तो वो तो होगा ही वहाँ और उसका भाई रॉनी और एक खास दोस्त सन्नी भी साथ होता है। बाकी लड़कों को पार्टी के कुछ दिन पहले यहाँ के क्लब में जमा करके मीटिंग होती है और एक खेल के जरिए वो बाकी के तीन लड़कों को चुनता है।

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  #32  
Old 8th May 2016
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कोमल- हाँ खन्ना का नाम सुना है.. वो तो बहुत पैसे वाला है और वहाँ कैसी मीटिंग होती है.. और कैसे चुनते हैं?

विवेक- इतना सब तू मत पूछ.. और वहाँ का नहीं पता.. मैं खुद वहाँ पहली बार जा रहा हूँ..

कोमल- अच्छा यह तो बता.. कोई लड़की इस खेल के लिए कैसे राज़ी होती है?

विवेक- अरे मेरी जान.. पैसा चीज ही ऐसी होती है… कि इंसान ना चाहते हुए भी वो सब काम कर लेता है.. जो उसको ठीक ना लगे.. समझी, वहाँ पर हर बार 1 लाख का इनाम होता है।

कोमल- ओ माय गॉड.. 1 लाख.. मगर फिर भी कोई लड़की अपने ब्वॉय-फ्रेण्ड के सामने सब कैसे करती होगी?

विवेक- अरे आजकल लड़की को पटा कर लड़का पहले चोद कर उस लड़की को लौड़े की आदी बनाता है.. और पैसे का लालच देकर उसको बड़े-बड़े सपने दिखाता है। बस इस तरह वो लड़की को मना लेता है और वैसे भी गेम शुरू होने के पहले वहाँ लड़की को इतना नशा करवा देते हैं कि उनको अच्छे-बुरे का पता ही नहीं होता यार.. और एक बात और भी समझ ले कि अधिकतर वे ही लड़कियाँ चूत चुदवाने को राजी होती हैं जिन्हें चुदने की ज्यादा भूख होती है, आजकल तो इसे मस्ती के नाम पर खुला खेल माना जाता है।

कोमल- चल सब समझ गई.. मगर पैसे कौन देता है?

विवेक- अरे पुनीत और कौन यार..?

कोमल- अरे उसको क्या फायदा.. और वो भी तो हारता होगा.. तो पैसे भी जाते है और गर्ल-फ्रेण्ड भी?

विवेक- मेरी जान.. वो एक ठरकी लड़का है.. उसको ऐसे गेम में मज़ा आता है.. नई-नई लड़कियों को चोदना उसका शौक है। वैसे वो चाहे तो ऐसे भी रोज नई लड़की उसके पास हो.. मगर उसको ऐसे खेल का शौक है बस.. पैसा देने के बहाने सबको बुलाता है और उसको एकाध लाख से क्या फ़र्क पड़ता है.. इतने पैसे तो वे लोग रोज ही उड़ा देते हैं। हाँ.. दोनों भाई इस खेल के माहिर खिलाड़ी हैं. उनको आसानी से हराना मुश्किल है। सालों का नसीब भी बहुत साथ देता है।

कोमल- अच्छा.. ये बात है.. तो अब तुम्हारा बॉस मेरे को गर्लफ्रेण्ड बना कर लेकर जाएगा.. यही ना?

सुनील- तू साली बहुत समझदार है.. जल्दी समझ गई.. हा हा हा हा..

कोमल- चल हट.. साला कुत्ता.. गर्ल-फ्रेण्ड के बहाने हम जैसी लड़कियों को ले जाते हैं वहाँ.. साले झूटे कहीं के..

विवेक- अरे तू गलत समझ रही है.. ऐसा कुछ नहीं है.. ज़्यादातर असली गर्लफ्रेण्ड ही होती हैं। इस बार बॉस का प्लान कुछ अलग है .. उसे एक लडकी को चोदना है.. तो वो एक नया गेम बना रहे हैं.. जिसमें सिर्फ़ तू हमारी मदद कर सकती है।

कोमल- कैसा नया गेम रे.. ज़रा ठीक से बता मेरे को?

विवेक ने जब बोलना शुरू किया तो कोमल की आँखें फटी की फटी रह गईं.. क्योंकि विवेक ने बात ही ऐसी कहीं थी।

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  #34  
Old 8th May 2016
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Story acchi hai but copy ki hui hai

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  #36  
Old 8th May 2016
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  #38  
Old 8th May 2016
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अभी मुनिया के पास चलो.. वहाँ देखते हैं क्या हुआ..

हाँ तो जब मुनिया ने पुनीत का लंड देखके अपना मुँह घुमाया.. तो पुनीत थोड़ा गुस्सा हो गया।

पुनीत- अरे मुनिया.. ऐसे करोगी तो कैसे काम कर पाओगी.. जाने दे तेरे से नहीं होगा.. कल तेरे को वापस घर भेज दूँगा।

मुनिया- नहीं नहीं बाबूजी.. मैं सब करूँगी.. मुझे पैसे कमाने हैं।

पुनीत- अच्छा तो आ.. इसको पकड़ कर देख.. इसकी मालिश कर.. मज़ा आएगा।

मुनिया उसके पास आ गई और लौड़े को गौर से देखने लगी।

मुनिया- बाबूजी आप चिंता ना करो.. मैंने पहले कभी ऐसी मालिश नहीं की है.. मगर में धीरे-धीरे सीख जाऊँगी।

पुनीत- मैं जानता हूँ मुनिया.. अब देर मत करो.. आओ शुरू करो..

मुनिया लौड़े को सहलाने लगती है और उसके नर्म हाथों के स्पर्श से पुनीत को मज़ा आने लगता है। वो अपनी आँखें बन्द कर लेता है।

शुरू में तो मुनिया को अजीब लग रहा था मगर बाद में लौड़े का अहसास उसे अच्छा लगने लगा और वो बड़े मज़े से लौड़े को सहलाने लगी।

पुनीत बीच-बीच में उसको आइडिया दे रहा था कि ऐसे करो और वो बस करती जा रही थी और पुनीत मज़ा ले रहा था। अब मुनिया अच्छी तरह से पुनीत के लौड़े को सहला रही थी।

पुनीत- आह आह.. मुनिया ऐसे सूखा सूखा.. मज़ा नहीं आ रहा.. अब मुँह से भी मालिश करो न.. आह्ह.. तुमने अगर अच्छे से किया.. तो तेरी नौकरी पक्की..

दोस्तो, मुनिया लंड और चूत के बारे में ज़्यादा नहीं जानती थी.. मगर ये खेल ऐसा है कि कुछ ना जानते हुए भी हमारा जिस्म पिघलने लगता है।

यही मुनिया के साथ हो रहा था.. उसकी चूत एकदम गीली हो गई थी और उसकी आँखों में मस्ती छा गई थी। अब उसको खुद लग रहा था कि लौड़े को मुँह में लेकर चूसे.. बस पुनीत ने कहा और उसने झट अपनी जीभ लौड़े पर रख दी और लण्ड की टोपी को चाटने लगी।

पुनीत- उफ़फ्फ़ आह्ह.. ऐसे ही.. आह्ह.. अब सारा दर्द निकल जाएगा.. आह्ह.. मुँह में लेकर चूस.. आह्ह.. पूरा लौड़ा अन्दर लेना है.. आह्ह..

अब मुनिया बड़े मज़े से लौड़े को जड़ तक लेने की कोशिश कर रही थी.. मगर उसके छोटे से मुँह में लौड़ा पूरा लेना मुश्किल था.. वो बस सुपारे को ही चूस पा रही थी.. जैसे कोई गन्ने को चूस रही हो।

पुनीत ने मुनिया के सर को पकड़ लिया और लौड़े को ज़ोर-ज़ोर से झटके देने लगा। उसकी नसें फूलने लगी थीं। लौड़ा कभी भी लावा उगल सकता था।

मुनिया की साँसें रुकने लगीं.. पुनीत अब स्पीड से उसके मुँह को चोद रहा था और कुछ ही देर में पुनीत के लंड ने वीर्य की धार मारी.. जो मुनिया के हलक में उतर गई।
ना चाहते हुए भी उसको सारा पानी पीना पड़ा। जब पुनीत ने हाथ हटाया तो मुनिया अलग हुई और लंबी साँसें लेने लगी।

मुनिया- हाय उहह.. ये आपने क्या किया बाबूजी.. मेरे मुँह में मूत दिया छी:..

पुनीत- अरे पगली ये मूत नहीं.. वीर्य है इसको पीने से लड़की और खूबसूरत होती है.. देख ये तो दूध जैसा है..

पुनीत के लौड़े से कुछ बूंदें और निकाली.. जो एकदम गाढ़ी सफेद थीं.. जिसको मुनिया गौर से देखने लगी।

मुनिया- हाँ बाबूजी.. ये तो सफेद है।

पुनीत- अरे जल्दी आ.. इसको जीभ से चाट ले.. नहीं तो नीचे गिर जाएगी।

पुनीत के कहने की देर थी.. मुनिया जल्दी से झुकी और बाकी बूंदों को भी चाट कर साफ करने लगी। उसको यह स्वाद अच्छा लग रहा था और इस खेल के दौरान उसकी चूत एकदम पानी-पानी हो गई थी.. जिसका अहसास मुनिया के साथ-साथ पुनीत को भी हो गया था। अब उसकी नज़र मुनिया की कच्ची चूत पर टिक गई थी।

पुनीत के लौड़े को चाटने के बाद मुनिया को बड़ा अजीब लग रहा था.. उसकी चूत बहुत पानी छोड़ रही थी और पुनीत इस बात को अच्छी तरह जानता था.. तो बस उसने मुनिया का हाथ पकड़ा और उसको बिस्तर पर बैठा दिया।

पुनीत- तूने बहुत अच्छी तरह मालिश की है.. अब देख एक तरीका मैं बताता हूँ.. अगली बार वैसे करना.. ठीक है..

मुनिया- ठीक है.. आप बता दो बाबूजी कैसे करना है.. मैं सब सीख जाऊँगी।

पुनीत ने उसको बिस्तर पर लिटा दिया और उसकी जाँघों पर अपने हाथ रख दिए.. जिससे मुनिया सिहर गई।

मुनिया- इसस्सस्स.. आह.. ये आप क्या कर रहे हो बाबूजी?

पुनीत- अरे डर मत.. तुझे सिखा रहा हूँ.. अगली बार ऐसे करना..

इतना कहकर पुनीत बड़े सेक्सी अंदाज में मुनिया की जाँघों को सहलाने लगा। मुनिया के जिस्म में तो बिजली दौड़ने लगी थी।

मुनिया- ककककक.. ठ..ठ..ठीक है.. मैं समझ गई.. आह्ह.. अब बस करो न..

पुनीत- अरे चुप.. अभी कहाँ.. आराम से सीख.. अब बिल्कुल भी बोलना मत..

पुनीत थोड़ा गुस्से में बोला.. तो मुनिया डर गई और उसने चुप्पी साध ली।

अब पुनीत धीरे-धीरे उसकी जाँघों को सहला रहा था.. कभी-कभी उसकी उंगली चूत को भी टच करती जा रही थी.. बस यही वो पल था.. जब मुनिया जैसी भोली-भाली लड़की वासना के भंवर में फँसती चली गई।

अब मुनिया को बड़ा मज़ा आ रहा था.. उसकी चूत फड़फड़ा रही थी और उसने अपनी आँखें बन्द कर ली थीं।

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  #39  
Old 8th May 2016
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पुनीत ने जब ये देखा कि मुनिया मज़े ले रही है.. तो उसने अपना हाथ सीधे उसकी फूली हुई चूत पर रख दिया और धीरे से चूत को रगड़ने लगा।

मुनिया- इसस्सस्स.. आह.. बाबूजी आह्ह.. नहीं.. मुझे कुछ हो रहा है.. आह्ह.. मेरे बदन का खून.. उफ्फ.. लगता है सारा वहीं जमा हो गया.. आह्ह.. नहीं इससस्स.. उफ़फ्फ़..

दोस्तो.. मुनिया पहले से ही बहुत गर्म थी और जब पुनीत ने चूत पर हाथ रखा और हल्की मालिश की.. बस बेचारी अपना संतुलन खो बैठी..। उसकी कच्ची चूत अपना पहला कामरस छोड़ने लगी। उस वक़्त मुनिया का बदन अकड़ गया.. उसने पुनीत के हाथ को अपने हाथ से दबा लिया और अजीब सी आवाजें निकालने लगी और झड़ने लगी।

मुनिया- इसस्स्सस्स.. आह.. उऊहह.. उउओह.. बब्ब..बाबूजी आह्ह.. मुझे क्या हो रहा है.. आआह्ह.. सस्सस्स..

जब मुनिया की चूत शांत हुई.. तब उसके दिमाग़ की बत्ती जली.. वो झट से बैठ गई और सवालिया नजरों से पुनीत को देखने लगी कि ये क्या हुआह्ह..

पुनीत- अरे घबरा मत.. तेरा भी कामरस निकल गया.. जैसे मेरा निकाला था.. अब तू ठीक है और सच बता.. तुझे मज़ा आया कि नहीं..

मुनिया- बाबूजी.. ये सब मेरी समझ के बाहर है.. आप मेहरबानी करके अभी यहाँ से चले जाओ.. मुझे अभी बाथरूम जाना है।

पुनीत- अरे तू यहाँ मेरी सेवा करने आई है या मुझ पर हुकुम चलाने आई है.. हाँ तेरी माँ ने यही सिखाया क्या तेरे को?

मुनिया- अरे नहीं नहीं.. बाबूजी.. आप गलत समझ रहे हो.. मैं तो बस ये कह रही थी.. कि मुझे जोरों से पेशाब आ रही है।

पुनीत- तो जाओ.. मैं यहीं बैठा हूँ.. आकर मेरा सर दबाना ओके..

मुनिया ने ‘हाँ’ में सर हिलाया और बाथरूम में चली गई। वहाँ जाकर उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी.. शायद अभी जो हुआ.. वो उसको सब अच्छा लगा था।

पुनीत अभी भी नंगा ही था और अपने लौड़े को सहलाता हुआ बोल रहा था- बेटा आज कई दिनों बाद तुझे कच्ची चूत का मज़ा मिलेगा..

कुछ देर बाद मुनिया वापस बाहर आ गई तो पुनीत लौड़े को सहला रहा था.. जिसे देख कर मुनिया थोड़ा मुस्कुरा दी।

पुनीत- अरे आओ मुनिया.. देखो तुमने अभी इसका दर्द निकाला था.. मगर इसमें दोबारा दर्द होने लगा।

मुनिया- कोई बात नहीं बाबूजी.. मैं फिर से इसका दर्द निकाल दूँगी।

पुनीत- ये हुई ना बात.. आओ यहाँ आओ.. पहले मेरे पास बैठो.. मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।

मुनिया धीरे-धीरे चलकर आई और बिस्तर पर पुनीत के पास बैठ गई.. मगर उसकी नज़र लौड़े पर थी। ना जाने क्यों.. उसको ऐसा लग रहा था.. जैसे जल्दी से पहले की तरह वो उसको मुँह में लेकर चूसे और उसका रस पी जाए।

उसकी नज़र को पुनीत ने ताड़ लिया और उसको अपने से चिपका कर उसके कंधे पर हाथ रख दिए।

पुनीत- देख मुनिया.. अब तू मेरे साथ रहेगी.. तो खूब मज़े करेगी.. बस तू मेरी हर बात मानती रहना.. तुझे पैसे तो मैं दूँगा ही.. साथ ही साथ मज़ा भी दूँगा.. जैसे अभी दिया.. तेरा रस निकाल कर दिया था.. तू सही बता मज़ा आया ना?

मुनिया थोड़ा शर्मा रही थी.. मगर उसने ‘हाँ’ में सर हिला दिया।

पुनीत- गुड.. अब सुन.. तुझे ज़्यादा मज़ा लेना है.. तो उस वीडियो की तरह अपने कपड़े निकाल दे.. फिर देख कितना मज़ा आता है।

मुनिया- ना बाबूजी.. मुझे शर्म आती है।

पुनीत- अरे पगली.. शर्म कैसी.. देख मैं भी तो नंगा हूँ और मैं बस तुझे सिखा रहा हूँ.. तू डर मत..

मुनिया- बाबूजी मैं जानती हूँ.. जब लड़की नंगी हो जाती है.. तो लड़का उसके साथ क्या करता है.. मगर मुझे ऐसा-वैसा कुछ नहीं करना।

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दोस्तो, मुनिया गाँव की थी.. सेक्स के बारे में शायद ज़्यादा ना जानती हो.. मगर कुछ ना जानती हो.. ऐसा होना मुमकिन नहीं..

अब देखो इशारे में उसने पुनीत को बता दिया कि वो सेक्स नहीं करेगी।

पुनीत- अरे तू क्या बोल रही है.. क्या ऐसा-वैसा तूने किसी के साथ पहले किया है क्या.. या किसी को देखा है..? बता मुझे.. तुझे किसने बताया ये सब?

मुनिया- ना ना.. मैंने कुछ नहीं किया.. वो बस एक बार हमारे पड़ोस में भाईजी को देखा था.. तब से पता है कि ये क्या होता है।

पुनीत- अरे क्या देखा था.. ज़रा ठीक से बता मुझे?

मुनिया- वो बाबूजी.. एक बार रात को मुझे जोरों से पेशाब लगी.. तो मैं घर के पीछे करने गई और जब मैं वापस आ रही थी.. तो हमारे पास में भैया जी का कमरा है.. वहाँ से कुछ आवाज़ आ रही थीं। मैंने सोचा इतनी रात को भाभी जी जाग रही हैं. सब ठीक तो है ना.. बस यही देखने चली गई और जब मैं नज़दीक गई.. तब देख कर हैरान हो गई।

पुनीत- क्यों ऐसा क्या देख लिया तूने?

मुनिया- व..व..वो दोनों.. नंगे थे.. और भैयाज़ी अपना ‘वो’ भाभी के नीचे घुसा रहे थे।

इतना बोलकर मुनिया ने अपना चेहरा घुमा लिया.. जो शर्म से लाल हो गया था।

पुनीत- अरे ठीक से बता ना.. क्या घुसा रहे थे.. और कहाँ घुसा रहे थे.. प्लीज़ यार बता ना?

मुनिया- मुझे नहीं पता.. मैं बस देखी और वहाँ से भाग गई।

पुनीत- बस इतना ही.. तो तेरे को इतना सा देख कर पता चल गया.. हाँ..

मुनिया- नहीं बाबूजी.. मैंने ये बात सुबह मेरी सहेली को बताई.. जिसकी कुछ दिन पहले शादी हुई है.. तब उसने मुझे बताया कि ये सब पति और पत्नी के बीच चलता है.. और फिर उसने मुझे सब बताया।

पुनीत- ओये होये.. मेरी मुनिया.. मैं तो तुझे भोली समझा था.. तू तो सब जानती है.. चल अच्छा है ना.. मुझे तुमको ज़्यादा समझाना नहीं पड़ेगा। अब चल देर मत कर.. निकाल अपने कपड़े मुझे तेरा जिस्म देखना है।

मुनिया- नहीं नहीं बाबूजी.. मैंने कहा ना.. मुझे वो नहीं करना.. आप उसके अलावा जो सेवा कहो.. मैं कर दूँगी। मगर वो काम नहीं..

पुनीत- अरे क्या.. तू ये और वो.. कह रही है.. साफ बोल कि चुदाई नहीं करूँगी.. तो मेरे को कौन सा तुझे चोदना है.. बस मेरी मालिश करवाने लाया हूँ। अब तुझे पैसे नहीं कमाने क्या.. जिंदगी भर ऐसे ही रहोगी क्या?

मुनिया- सच बाबूजी.. आप मेरे साथ वो नहीं करोगे ना.. तब तो आप जो कहो मैं कर दूँगी।

पुनीत- अरे वाह.. मेरी जान यह हुई ना बात.. चल अब जल्दी से कपड़े निकाल.. मैं बस तेरे जिस्म को देखूँगा। उसके बाद तू मेरे लौड़े को चूस कर इसका दर्द मिटा देना।

मुनिया- बाबूजी पहले आप आँखें बन्द करो ना.. मुझे शर्म आ रही है।

पुनीत ने उसकी बात मान ली और आँखें बन्द कर लीं और मुनिया ने अपने कपड़े निकाल दिए। पहले उसने सोचा ब्रा रहने दें.. मगर ना जाने क्या सोच कर उसने वो भी निकाल दी। अब वो एक कोने में खड़ी अपनी टाँगों को भींच कर चूत को छुपाने लगी थी और हाथों से अपने चूचे छुपा रही थी।

पुनीत- अरे क्या हुआ जान.. अब आँख खोल लूँ क्या.. बोलो ना?

मुनिया- हाँ बाबूजी.. खोल लो..

जब पुनीत ने आँखें खोलीं.. तो उसके सामने एक कच्ची कन्या.. अपनी जवानी का खजाना छुपाए हुए खड़ी थी.. जिसे देख कर उसका लौड़ा फुंफकारने लगा। वो बस देखता ही रह गया।

पुनीत- अरे ये क्या है.. तुमने तो सब कुछ छुपा रखा है यार.. ऐसे कैसे चलेगा.. अब यहाँ आओ और सुनो हाथ ऊपर करके धीरे-धीरे आना, तुम्हें तेरी माँ की कसम है।

मुनिया- हाय बाबूजी.. आपने माई की कसम क्यों दे दी.. मैं अब क्या करूँ.. मुझे बहुत शर्म आ रही है और माई की कसम भी नहीं तोड़ सकती!

पुनीत- ठीक है.. अब ज़्यादा सोचो मत.. बस मैंने जैसे बताया.. वैसे आओ आराम-आराम से..

मुनिया ने दोनों हाथ ऊपर कर लिए। अब उसके 30″ के मम्मे आज़ाद थे.. जो एकदम गोल-गोल और उन पर हल्के गुलाबी रंग की बटन.. यानि कि उसके छोटे से निप्पल.. सफेद संगमरमरी जिस्म पर वो गुलाबी निप्पल कुदरत की अनोखी कारीगिरी की मिसाल दे रहे थे।

मुनिया धीरे से आगे बढ़ रही थी और पुनीत भी बड़े आराम से ऊपर से नीचे अपनी नज़र दौड़ा रहा था। अब उसकी नज़र मुनिया के पेट से होती हुई उसकी जाँघों के बीच एक लकीर पर गई.. यानि उसकी चूत की फाँक पर गई.. जो ऐसे चिपकी हुई थी.. जैसे फेविकोल से चिपकी हुई हो और चूत के आस-पास हल्के भूरे रंग के रोंए उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे। उसकी मादक चाल से पुनीत का लौड़ा झटके खाने लगा।

पुनीत की नज़र से जब मुनिया की नज़र मिली.. तो वो शर्मा गई और तेज़ी से भाग कर पुनीत के पास आ गई।

पुनीत ने उसे अपने आगोश में ले लिया और उसके नर्म पतले होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो बस मुनिया के होंठों को चूसने लग गया। उसके मस्त चूचों को मसलने लगा।

इस अचानक हमले से मुनिया थोड़ी घबरा गई और उसने पुनीत को धकेल कर एक तरफ़ कर दिया और खुद जल्दी से खड़ी हो गई।

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